जब याद आया मेरा बचपन………
‘बचपन के दिन भुला न देना, आज हँसे कल रुला न देना,’ ये गीत सुनकर मन मंत्रमुग्ध हो जाता है| बीता हुआ समय कमरे के रोशन दान से सूरज की पहली किरण बनकर घर को रोशन कर जाता है| बचपन एक ऐसा समय है, जो मन को प्रफुल्लित कर देता है | जिसे सोच कर सबसे पहले हरे-भरे मैदान ,मिटटी की सोंधी खुशबू के साथ वो सारी शैतानियाँ, खेल कूद मन को रोमाचित कर देता है |बिना छल-कपट के दोस्त बनाये जाते थे जंहा कुछ भी न तेरा था, न मेरा |बस हमारा हुआ करता था |
सच वो बचपन स्वय में खुशियों का खजान था| चाहे अमीर हो या गरीब, छोटा हो या बड़ा सब के जीवन में बचपन का एक अलग ही रंग है और उस से जुडी ढेरों स्मृतियाँ हैं| और लोग अपनी प्रगति और खुशी के लिए अक्सर उत्सुक रहा करते थे| बचपन की बात हो और खेलों के बारे में बात न की जाये तो बचपन अधूरा है |खेल तो बचपन की जान हैं, उसके बिना बचपन की कल्पना ही बेमानी सी लगती है|
जंहा तक बात है खेलो की तो उनका मजा जो गांव में आता वो शहरो में कंहा ? हरे भरे मैदान होते थे, पेड के नीचे गिल्ली – डंडा छुपन छुपाई, क्रिकेट, कबड्डी, बर्फ-पानी,ऊँच नीच, कंचे,छुवन-छुवाई लूडो, शतरंज, कैरम,बैड-मिन्टन, बाली–बाल जैसे खेलो को खेल कर मन को शान्ति मिलती ही थी तन भी स्वस्थ रहता था | जब मैं खेला करता था सुबह,शाम और दिनभर| घर से दूर तक खेलने जाना अपने आप में सुखद अनुभव होता था| दोस्तों की भी कमी नहीं होती थी खेलो की भी उस समय लड़ी लगी रहती थी| कभी कभी आपस में झगडते थे तो कभी कभी मिल कर रोया करते थे| गुल्ली डंडा और क्रिकेट बड़े प्रेम से मिल जुलकर खेला करते थे दिन बीत जाता था मगर खेल कभी नहीं खत्म होता था उस खेल में इतना डूब जाते थे घर जाकर सो जाया करते थे | खेल में इतना खो जाते थे की अध्यापक की डाट और उनके द्वारा भेजी गए घर में शिकायत से अक्सर सामना करते थे| और कभी कभी पिटाई भी हो जाती थी| लेकिन खेलों से रिश्ता अभी तक नहीं टूटा| रोज नए-नए खेल बनाये जाते थे और वादों के साथ बिना छल किये उन्हें खेला जाता था| खेलो में इतना डूब जाते थे खाने-पीने तक का ध्यान नहीं रहता था तब जीवन में प्रतिस्पर्धा नहीं थी न ही लोगो की हैसियत का अंदाजा उनके कपड़ो से लगाया जाता था जिसने हाथ बड़ा कर दोस्ती करनी चाही उसे दोस्त बना लिया |और खेल खेलना शुरू कर देते थे| कोई भी मिल जाता था बस उसके साथ में खलने लगते थे जो भी प्यार से मिलता उसके हो लेते | मिटटी में कपडे गंदे करने के बाद घर पर डाट भी पड़ती थी | फिर भी सब कुछ भूल कर अगला दिन इस आशा पर टिका रहता था की आज फिर कुछ नया करना है, खेलना है और बहुत सारी खुशियाँ अपने दामन में समेटना हैं |
मोहल्ले का हर व्यक्ति अपना सा लगता था ,उनकी हर खुशी में शामिल होना मानो एक रिवाज़ था| जीवन इतना कठिन नहीं था और न ही लोग कठोर थे सब कुछ हमारे हिसाब से होता था | उनकी नज़र में सब लोग एक जैसे ही होते थे| न कोई धर्म न कोई जाति| होली पर हुडदंग होता था, ईद बकरीद में भी सब आपस में मिलते थे| तब जीवन का एक मात्र उद्देश्य साथ मिल कर चलना था लड़ना झगडना नहीं| अगर हम झगडते भी थे तो बचपन की नादानियों में खेल खेल में उसे भुला देते थे और फिर जिंदगी का मजा लेने लगते थे| और थक हार कर जब हम अपने घर जाते थे वो माँ की प्यार भरी डाट खाने को मिलती थी| खाना तो बात में मिलता था लेकिन माँ कुछ ऐसी बाते बताती थी जो हमारे भविष्य को उज्जवल करने की सलाह देती थी कहती थी बेटा धुप में मत खेला करो तुम्हारी सेहत खराब हो जायेगी, अगर सेहत पे कुछ असर पड़ा तो तुम पढाई नहीं कर पाओगे, अगर पढ़ाई नहीं कर पाओगे तो जिंदगी जीने के नज़रिए को नहीं समझ पाओगे अगर तुम जिंदगी का नजरिया नहीं सिखते तो तुम्हे लोग आवारा, या ऐसे कई बातों से संबोधित करेंगे | लेकिन मैंने माँ से कहा की खेल ही जीवन बनाता है और जीवन बिगडता भी है| खेल आज ऐसे मुकाम पर पहुच चुका है की इसके जरिये हम आप का नाम रोशन कर सकते हैं, लेकिन मेरे इतने समझाने के बाद मेरी माँ ने कहा कि तुम सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान दोगे और खेल कूद की बाते आज से मेरे सामने नहीं करोगे| तब मैं खाना खाकर माँ की बात न मानते हुए मैं बल्ला और गेंद लेकर दोस्तों के साथ खेलने चला जाता था| और जब मैं शाम को घर वापस आता था तो मेरी माँ पिताजी से मेरी सिकायत करती थी की इतना समझाने के बाद भी ये लड़का अपनी हरकतों से बाज नहीं आता और मुझे बेवक़ूफ़ बना कर खेलने चला जाता है, तब पिताजी बहुत गुस्से में आकार डंडा उठाकर मेरी तरफ बढते तो मैं उछल कर पापा के सामने बेशर्मी से मुस्कुराकर भाग जाता था| और मस्ती करने के बाद फिर वापस आ जाता था और तब तक पिताजी का गुस्सा भी ठंडा हो जाता था| और यही सब बाते रोज चला करती थी| फिर पिताजी मुझे पास बुलाकर माँ की वही बाते, जो मुझे समझाया करती थी वही बाते वो बताया करते थे की तुम्हारी माँ जो बोल रही है वो बाते बहुत हद तक सही है |बेटा खेल को खेल की तरह से खेलो और साथ में पढ़ाई पे भी ध्यान लगाओ| केवल खेल खेलने से जिंदगी का रुख नहीं बदलता उसके लिए पढ़ाई भी जरुरी है जिसे ज्ञान प्राप्त होता है|
उस समय जीवन में थे कई तरह के रंग कई तरह के सपने दिन बीते रातें बीती और बचपन भी बीत गया| आज की इस भाग दौड दुनिया में बहुत कुछ पीछे छूट गया| कंप्यूटर, विडियो गेम, और कार्टून चैनल , ने बच्चो का बचपन छीन लिया है | वो उन खेलो से बहुत दूर हो चुके हैं जो कभी हमारे जीवन में खासा महत्व रखते थे| आबादी बढ़ने के साथ साथ पर्यावरण का दूषित होना भी इसका एक कारण है | जब वो बचपन याद आता है मेरा दिल भर जाता है मन करता है फिर से खेलू वो अलबेले खेल पर वक्त नहीं मिल पाता| उन दोस्तों का साथ भी छुट चुका है सबने पाने लिए कोई न कोई रास्ता खोज लिया है सबको प्रगति करनी है सब को आगे बढ़ना है| इन सबके बावजूद भी अगर कुछ नहीं बदला वो है हमारे बचपन की यांदे जो मन में आज भी समाई हुई हैं| गांहे-बगान्हें जो याद आ ही जाति हैं और इस भाग दौड भरी जिंदगी में कुछ पल की हंसी दे जाती हैं|
वीरेन्द्र कुमार की पेशकश
‘बचपन के दिन भुला न देना, आज हँसे कल रुला न देना,’ ये गीत सुनकर मन मंत्रमुग्ध हो जाता है| बीता हुआ समय कमरे के रोशन दान से सूरज की पहली किरण बनकर घर को रोशन कर जाता है| बचपन एक ऐसा समय है, जो मन को प्रफुल्लित कर देता है | जिसे सोच कर सबसे पहले हरे-भरे मैदान ,मिटटी की सोंधी खुशबू के साथ वो सारी शैतानियाँ, खेल कूद मन को रोमाचित कर देता है |बिना छल-कपट के दोस्त बनाये जाते थे जंहा कुछ भी न तेरा था, न मेरा |बस हमारा हुआ करता था |
सच वो बचपन स्वय में खुशियों का खजान था| चाहे अमीर हो या गरीब, छोटा हो या बड़ा सब के जीवन में बचपन का एक अलग ही रंग है और उस से जुडी ढेरों स्मृतियाँ हैं| और लोग अपनी प्रगति और खुशी के लिए अक्सर उत्सुक रहा करते थे| बचपन की बात हो और खेलों के बारे में बात न की जाये तो बचपन अधूरा है |खेल तो बचपन की जान हैं, उसके बिना बचपन की कल्पना ही बेमानी सी लगती है|
जंहा तक बात है खेलो की तो उनका मजा जो गांव में आता वो शहरो में कंहा ? हरे भरे मैदान होते थे, पेड के नीचे गिल्ली – डंडा छुपन छुपाई, क्रिकेट, कबड्डी, बर्फ-पानी,ऊँच नीच, कंचे,छुवन-छुवाई लूडो, शतरंज, कैरम,बैड-मिन्टन, बाली–बाल जैसे खेलो को खेल कर मन को शान्ति मिलती ही थी तन भी स्वस्थ रहता था | जब मैं खेला करता था सुबह,शाम और दिनभर| घर से दूर तक खेलने जाना अपने आप में सुखद अनुभव होता था| दोस्तों की भी कमी नहीं होती थी खेलो की भी उस समय लड़ी लगी रहती थी| कभी कभी आपस में झगडते थे तो कभी कभी मिल कर रोया करते थे| गुल्ली डंडा और क्रिकेट बड़े प्रेम से मिल जुलकर खेला करते थे दिन बीत जाता था मगर खेल कभी नहीं खत्म होता था उस खेल में इतना डूब जाते थे घर जाकर सो जाया करते थे | खेल में इतना खो जाते थे की अध्यापक की डाट और उनके द्वारा भेजी गए घर में शिकायत से अक्सर सामना करते थे| और कभी कभी पिटाई भी हो जाती थी| लेकिन खेलों से रिश्ता अभी तक नहीं टूटा| रोज नए-नए खेल बनाये जाते थे और वादों के साथ बिना छल किये उन्हें खेला जाता था| खेलो में इतना डूब जाते थे खाने-पीने तक का ध्यान नहीं रहता था तब जीवन में प्रतिस्पर्धा नहीं थी न ही लोगो की हैसियत का अंदाजा उनके कपड़ो से लगाया जाता था जिसने हाथ बड़ा कर दोस्ती करनी चाही उसे दोस्त बना लिया |और खेल खेलना शुरू कर देते थे| कोई भी मिल जाता था बस उसके साथ में खलने लगते थे जो भी प्यार से मिलता उसके हो लेते | मिटटी में कपडे गंदे करने के बाद घर पर डाट भी पड़ती थी | फिर भी सब कुछ भूल कर अगला दिन इस आशा पर टिका रहता था की आज फिर कुछ नया करना है, खेलना है और बहुत सारी खुशियाँ अपने दामन में समेटना हैं |
मोहल्ले का हर व्यक्ति अपना सा लगता था ,उनकी हर खुशी में शामिल होना मानो एक रिवाज़ था| जीवन इतना कठिन नहीं था और न ही लोग कठोर थे सब कुछ हमारे हिसाब से होता था | उनकी नज़र में सब लोग एक जैसे ही होते थे| न कोई धर्म न कोई जाति| होली पर हुडदंग होता था, ईद बकरीद में भी सब आपस में मिलते थे| तब जीवन का एक मात्र उद्देश्य साथ मिल कर चलना था लड़ना झगडना नहीं| अगर हम झगडते भी थे तो बचपन की नादानियों में खेल खेल में उसे भुला देते थे और फिर जिंदगी का मजा लेने लगते थे| और थक हार कर जब हम अपने घर जाते थे वो माँ की प्यार भरी डाट खाने को मिलती थी| खाना तो बात में मिलता था लेकिन माँ कुछ ऐसी बाते बताती थी जो हमारे भविष्य को उज्जवल करने की सलाह देती थी कहती थी बेटा धुप में मत खेला करो तुम्हारी सेहत खराब हो जायेगी, अगर सेहत पे कुछ असर पड़ा तो तुम पढाई नहीं कर पाओगे, अगर पढ़ाई नहीं कर पाओगे तो जिंदगी जीने के नज़रिए को नहीं समझ पाओगे अगर तुम जिंदगी का नजरिया नहीं सिखते तो तुम्हे लोग आवारा, या ऐसे कई बातों से संबोधित करेंगे | लेकिन मैंने माँ से कहा की खेल ही जीवन बनाता है और जीवन बिगडता भी है| खेल आज ऐसे मुकाम पर पहुच चुका है की इसके जरिये हम आप का नाम रोशन कर सकते हैं, लेकिन मेरे इतने समझाने के बाद मेरी माँ ने कहा कि तुम सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान दोगे और खेल कूद की बाते आज से मेरे सामने नहीं करोगे| तब मैं खाना खाकर माँ की बात न मानते हुए मैं बल्ला और गेंद लेकर दोस्तों के साथ खेलने चला जाता था| और जब मैं शाम को घर वापस आता था तो मेरी माँ पिताजी से मेरी सिकायत करती थी की इतना समझाने के बाद भी ये लड़का अपनी हरकतों से बाज नहीं आता और मुझे बेवक़ूफ़ बना कर खेलने चला जाता है, तब पिताजी बहुत गुस्से में आकार डंडा उठाकर मेरी तरफ बढते तो मैं उछल कर पापा के सामने बेशर्मी से मुस्कुराकर भाग जाता था| और मस्ती करने के बाद फिर वापस आ जाता था और तब तक पिताजी का गुस्सा भी ठंडा हो जाता था| और यही सब बाते रोज चला करती थी| फिर पिताजी मुझे पास बुलाकर माँ की वही बाते, जो मुझे समझाया करती थी वही बाते वो बताया करते थे की तुम्हारी माँ जो बोल रही है वो बाते बहुत हद तक सही है |बेटा खेल को खेल की तरह से खेलो और साथ में पढ़ाई पे भी ध्यान लगाओ| केवल खेल खेलने से जिंदगी का रुख नहीं बदलता उसके लिए पढ़ाई भी जरुरी है जिसे ज्ञान प्राप्त होता है|
उस समय जीवन में थे कई तरह के रंग कई तरह के सपने दिन बीते रातें बीती और बचपन भी बीत गया| आज की इस भाग दौड दुनिया में बहुत कुछ पीछे छूट गया| कंप्यूटर, विडियो गेम, और कार्टून चैनल , ने बच्चो का बचपन छीन लिया है | वो उन खेलो से बहुत दूर हो चुके हैं जो कभी हमारे जीवन में खासा महत्व रखते थे| आबादी बढ़ने के साथ साथ पर्यावरण का दूषित होना भी इसका एक कारण है | जब वो बचपन याद आता है मेरा दिल भर जाता है मन करता है फिर से खेलू वो अलबेले खेल पर वक्त नहीं मिल पाता| उन दोस्तों का साथ भी छुट चुका है सबने पाने लिए कोई न कोई रास्ता खोज लिया है सबको प्रगति करनी है सब को आगे बढ़ना है| इन सबके बावजूद भी अगर कुछ नहीं बदला वो है हमारे बचपन की यांदे जो मन में आज भी समाई हुई हैं| गांहे-बगान्हें जो याद आ ही जाति हैं और इस भाग दौड भरी जिंदगी में कुछ पल की हंसी दे जाती हैं|
वीरेन्द्र कुमार की पेशकश