Tuesday, 24 November 2020

शिमला की यादगार यात्रा - अनोखा शहर (माँ तारा देवी मंदिर )

शिमला की यादगार यात्रा - अनोखा शहर (माँ तारा देवी मंदिर ) 




आज बात करते हैं समुद्र तल से 7200 फीट की ऊंचाई पर स्थित हैं माँ तारा देवी के ऐतिहासिक मंदिर की जो शिमला शहर से लगभग 11 किलोमीटर हैं। 250 साल पुराने मंदिर की स्थापना 1766 ई0 में सेन वंश के शक्तिशाली राजा भूपेंद्र सेन के द्वारा जुग्गर गाँव की एक ऊँची पहाड़ी की गई थी. मंदिर से पहले यंहा पर एक घना जंगल हुआ करता था, लोगों की मान्यता है कि जुग्गर के जंगल के माँ तारा देवी वास करती हैं. तारा देवी मंदिर जाने के लिए आप टैक्सी, बस और अपने निजी वाहन का सहारा ले सकते हैं। बस आपको पुराना बस अड्डा शिमला से मिल जाएगी और टैक्सी किसी भी स्टैंड से कर सकते हैं, जो आपको शोघी होते हुए तारा देवी मंदिर ले जाएगी। ट्रैकिंग के शौकीन लोगों तारा देवी मंदिर जाने के लिए कच्ची घाटी से लगभग 6 किलोमीटर का पैदल पथ भी है जिसका लुफ्त उठा सकते हैं पैदल मार्ग से आपको गहरी और सुंदर वादियां, हरियाली, लम्बे-लम्बे चीड़, क्वेर्कस इन्काना बांज, सागौन, देवदार के पेड़, सकरा रास्ता जो आपकी यात्रा को एडवेंचर बना देगा। रास्ते मे आराम करने के लिए जगह जगह बेंच लगी हैं, जिस पर बैठकर आराम कर अपनी यात्रा शुरू कर सकते हैं. बीच रास्ते मे आपको बड़े-बड़े लंबे घने पेड़ आपका मन मोह लेंगे। हरे भरे पेड़ों से लदे पहाड़ यात्रा का सुखद अनुभव देंगे। रास्ते मे ऐसी कई जगह हैं जंहा पर बैठकर आप पिकनिक का आनंद भी ले सकते हैं। माँ तारा देवी की यात्रा के दौरान नीचे की तरफ घाटी में एक सदियों पुराना शिव मंदिर पड़ता है वंहा भी आप शिव दर्शन कर आगे बढ़ सकते हैं वापस आते वक्त भी आपको शिव दर्शन प्राप्त हो जाएंगे आप अपनी सुविधानुसार चयन कर सकते हैं परन्तु दर्शन जरूर करें। रास्ते के लिए खाने-पीने की चीज साथ रख कर जाएं तो यात्रा ज्यादा सुखद होगी। पिकनिक का प्लान भी आप बना सकते हैं, रास्ते मे एक खेल का मैदान भी पड़ेगा ज्यादा बड़ा तो नही होगा पर आप अपने समय और सुविधा के अनुसार कोई भी खेल खेल सकते हैं। ट्रैकिंग के वक़्त आपको पानी और खाने की आवश्यकता पड़ेगी। 5 से 6 किलोमीटर की ट्रैकिंग में लगभग 2 से 3 घंटे लग सकते हैं. परंतु वापस आने में समय की काफी बचत होगी। स्वस्थ व्यक्ति ही ट्रैकिंग करे ऐसा मेरा सुझाव है क्योंकि अस्वस्थ व्यक्ति को चढाई करते वक़्त सांस की समस्या उत्पन्न हो सकती है. अस्वस्थ व्यक्ति अगर माँ तारा देवी के दर्शन करना चाहता है तो वह बस, टैक्सी या अपने निजी वाहन का इस्तेमाल करे ज्यादा समस्या नहीं आएगी जंहा पर आपको बस उतारेगी वंहा से सीढ़ी और स्लोप के द्वारा मंदिर परिसर में पहुंच सकते हैं खाने पीने की चीजों के लिए एक बैग जरूर रखे क्योंकि बंदर आपके खाने-पीने की चीजों पर झपट सकते हैं और साथ आपको नुकसान भी पहुचा सकते हैं। अब बात करते हैं की मंदिर के इतिहास की, मंदिर का निर्माण सेन वश राजा भूपेंद्र सेन ने करवाया था। यह मदिर हिंदू धर्म के साथ बौद्ध धर्म के लिए भी काफी महत्त्व रखता है। माँ तारा देवी की बनी लकड़ी की प्रतिमा आपको आकर्षित करेगी। मंदिर परिसर को बनाने में अधिकतर लकड़ी का प्रयोग किया गया है जो परिसर की सुंदरता का मनोरम दृश्य आपकी यात्रा यादगार बना देगा। स्थानीय निवासियों के अनुसार माँ तारा देवी क्योंथल रियासत की कुलदेवी मानी जाती है. एक बार राजा भूपेंद्र सेन जुग्गर के जंगल में शिकार करने के लिए के लिए गए वंही पर झाड़ियों में से शेर के गर्जने की आवाज सुनाई दी फिर थोड़ी देर बाद वंही से एक स्त्री की आवाज सुनाई दी और राजन से बोली की हे राजन मैं तुम्हारी कुलदेवी हूँ जिसे तुम्हारे पूर्वज बंगाल में ही भूल से छोड़ आये थे, तुम मेरी मूूर्ति की यंही पर स्थापना करा दो और मैं तुम्हारे कुल की रक्षा करुँगी राजा ने तुरंत ही आदेश का पालन किया और गांव जुग्गर की ऊंची पहाड़ी पर माँ तारा देवी की मूर्ति की स्थापना विधि विधान के साथ करवा दी। माँ तारा देवी के दर्शन के साथ भंडारे का आनंद भी ले सकते हैं, प्रत्येक रविवार और कभी-कभी मंगलवार को भी भण्डारे का आयोजन यंहा पर किसी न किसी व्यक्ति (भक्त ) द्वारा भण्डारे का आयोजन किया जाता है, कोई भी प्रसाद के रूप में ग्रहण कर सकता है और कोई भी भंडरा आयोजन करवा सकता है| तारा देवी मंदिर परिसर में मंदिर न्यास समिति बानी हुई है जो मंदिर का रख रखाव और भण्डारे आयोजित होता है. रविवार के भंडारे का आयोजन करने के लिए यंहा पर पहले ही बुकिंग करवानी पड़ती हैं बुकिंग में आपको एक तारीख मिलती है वो तारीख महीने बाद, साल बाद, पांच साल बाद की भी हो सकती है. भण्डारे की डेट आने से तीन महीने पहले एक रिमांडर भेजा जाता है और बताया जाता है की आपकी बारी इस इन आएगी। भण्डारा आयोजित करने के लिए कोई भी पैसा जमा नहीं होता है सिर्फ भंडारे के एक दिन पहले आपको भंडारे का राशन मंदिर परिसर में पहुंचना होता है. भण्डरा किसके द्वारा आयोजित का नाम भी पंदिर परिसर के गेट के पास लगा दिया जाता है अगर वो चाहे तो नाम गुप्त भी रखवा सकता है. बुकिंग के लिए मंदिर का ऑफिस 10 बजे से लेकर शाम 5 बजे तक खुला रहता है और इस समय के बीच कोई भी आकर बुकिंग करवा सकता है. मंगलवार का भंडारा करवाने के लिए डेट की समस्या नही होती जल्दी ही भंडारे की डेट मिल जाती है।

Monday, 4 November 2013

आई आई एम् लखनऊ (वर्चस्व कार्यक्रम )  नाटक का मंचन:-



















Saturday, 16 March 2013

वीर की हलचल( प्यार हमे किस मोड़ पे ले आया)


प्यार हमे किस मोड़ पे ले आया .............


ज़िन्दगी हमे कब क्या सीखा दे पता ही नहीं चलता हर पल हमे ज़िन्दगी कुछ न कुछ न कुछ सिखाया ही करती है | कुछ अच्छा सिखाती है तो कुछ बुरा अच्छा जब सिखाती है तब हम उसे हमेशा याद रखने की कोशिस करते हैं और अगर ज़िन्दगी ने कुछ बुरा सिखाया तो उसे बुरा वक़्त मानकर भूलने की कोशिस करते हैं परन्तु फिर भी हम इसमें कामयाब नहीं हो पाते | ज़िन्दगी भी कितनी अजीब है हम उसे तब तक नहीं छोड़ सकते जब तक ज़िन्दगी न चाहें और यंही पर किस्मत का कनेक्सन भी बहुत ही अजीब है जो मौत पर भी पहरा लगा देती है| अक्सर जब अकेला तन्हा बैठता हूँ तो बहुत सोचता हूँ की ज़िन्दगी कन्हा से कन्हा ले आई हमे| ज़िन्दगी में उतार चढ़ाव इतनी जल्दी आये की हम समझ ही न सके की ज़िन्दगी ने कैसे यु टर्न कर लिया | ज़िन्दगी और मौत से बड़े करीब से दीदार किया है हमने कई बार| ज़िन्दगी मेंबार अगर एक बार भी प्यार हो जाए तो कहने ही क्या है हालाँकि हासिल तो कुछ नहीं होता सिवाय दर्द और तन्हाई के खासतौर से तब आप उस शख्स के लिए सब कुछ करते है और वाही शख्स आपको न समझे और अपनी ही खुशियों की तलाश करे | खिलौने की तरह कोई खेलता है तो कोई इस्तेमाल करता है , प्यार हमे इस मोड़ पे आज पहली बार ले आया की हम खुद को भूल गए की हम कौन है क्या है और हमरी औकात क्या है सब प्यार ने हमे बता दिया , और हमने प्यार करने जहमत उठा डाली और चल पड़े बिना कुछ सोचे समझे| ऊपर वाला भी बड़ा गजब खेल खेता है ज़िन्दगी में उसे ही आपके सबसे करीब भेजेगा जो आपकी ज़िन्दगी को बदल देगा पर कभी अपना न हो सकेगा भले ही आप कितनी भी सिददत से चाहों और उसके लिए हर पल हर लम्हा ही क्यों न लुटा दो चाहे ज़िन्दगी में कितने भी कांटे आ जाए पसंद वाही आती है जिसका किस्मत से कोई कनेक्सन नहीं होता है|
कोसता हूँ हर पल हर घडी उस लम्हे को जब उसे देखकर चेहरे पर दिल से मुस्कान आइ, ज़िन्दगी से प्यार हुआ न जाने क्या बात है उसमे आज तक नहीं पता चला, और दिल भी कितना कमीना होता है दगा दे ही जाता है वन्ही जाकर बैठ जाता है जन्हा उसका ठिकाना नहीं | अक्सर  उसी पे टिकता है जो नसीब में नहीं, दिल और दिमाग काबू में न रहे तो ज़िन्दगी में हर वो काम हो जाते है जिससे कभी आप नफरत किया करते थे और भले ही उन्ही कारणों से आप ने ज़िन्दगी का सबसे बड़ा दुःख ही क्यों न देखा हो, फिर भी किस्मत की बेवफाई बंद नहीं होती दगा देती ही रहती है, भले ही कितनी कोशिस कर ले आप ज़िन्दगी में एक समय अँधेरा आ ही जाता है और प्यार के मायने समझा ही जाता है | भले ही खुद का क्यों न प्रोपेगंडा बना लो बस उन्हें एक वजह चाहिए गलत समझने की, इंसान प्यार में कमज़ोर तब पढ जाता है जब वो अपने प्यार की ख़ुशी के लिए सब कुछ करने को तैयार हो जाता है और वक़्त उसकी ही खुशियाँ तलाशा  करता है खुद को ही  भूल कर कोई पागल कहना शुरू देता है तो कोई कहता है फिलोसोफेर हो गए हो क्या है मुझे खुद नहीं पता क्या हूँ बस इतना जनता हु की खुद में सही हूँ , ज़िन्दगी ने ऐसी करवट ली की समझ ही न सके की क्या हुआ और क्या हो रहा है बस एक ही जगह अटके रहे और ज़िन्दगी की हर चीज दांव पर लग गई पर आज पता चला की किसी को कोई फर्क ही नहीं पड़ता है सिवाय खुद, कितना भी कर किसी के लिए कंही न कंही किस्मत धोखा दे ही देती है और हम उसकी ख़ुशी तलाशने में जुटे रहते हैं हर वक़्त जिसको खुद की ख़ुशी से तो प्यार है पर दूसरों की ख़ुशी से नहीं शायद यही ज़िन्दगी है, ज़िन्दगी तो हमे सुरु से अभी तक कुछ न कुछ सीखा ही रही है,  

Wednesday, 11 April 2012

बचपन की कुछ यादें................

जब याद आया मेरा बचपन………
‘बचपन के दिन भुला न देना, आज हँसे कल रुला न देना,’ ये गीत सुनकर मन मंत्रमुग्ध हो जाता है| बीता हुआ समय कमरे के रोशन दान से सूरज की पहली किरण बनकर घर को रोशन कर जाता है| बचपन एक ऐसा समय है, जो मन को प्रफुल्लित कर देता है | जिसे सोच कर सबसे पहले हरे-भरे मैदान ,मिटटी की सोंधी खुशबू के साथ वो सारी शैतानियाँ, खेल कूद मन को रोमाचित कर देता है |बिना छल-कपट के दोस्त बनाये जाते थे जंहा कुछ भी न तेरा था, न मेरा |बस हमारा हुआ करता था |
सच वो बचपन स्वय में खुशियों का खजान था| चाहे अमीर हो या गरीब, छोटा हो या बड़ा सब के जीवन में बचपन का एक अलग ही रंग है और उस से जुडी ढेरों स्मृतियाँ हैं| और लोग अपनी प्रगति और खुशी के लिए अक्सर उत्सुक रहा करते थे| बचपन की बात हो और खेलों के बारे में बात न की जाये तो बचपन अधूरा है |खेल तो बचपन की जान हैं, उसके बिना बचपन की कल्पना ही बेमानी सी लगती है|
जंहा तक बात है खेलो की तो उनका मजा जो गांव में आता वो शहरो में कंहा ? हरे भरे मैदान होते थे, पेड के नीचे गिल्ली – डंडा छुपन छुपाई, क्रिकेट, कबड्डी, बर्फ-पानी,ऊँच नीच, कंचे,छुवन-छुवाई लूडो, शतरंज, कैरम,बैड-मिन्टन, बाली–बाल जैसे खेलो को खेल कर मन को शान्ति मिलती ही थी तन भी स्वस्थ रहता था | जब मैं खेला करता था सुबह,शाम और दिनभर| घर से दूर तक खेलने जाना अपने आप में सुखद अनुभव होता था| दोस्तों की भी कमी नहीं होती थी खेलो की भी उस समय लड़ी लगी रहती थी| कभी कभी आपस में झगडते थे तो कभी कभी मिल कर रोया करते थे| गुल्ली डंडा और क्रिकेट बड़े प्रेम से मिल जुलकर खेला करते थे दिन बीत जाता था मगर खेल कभी नहीं खत्म होता था उस खेल में इतना डूब जाते थे घर जाकर सो जाया करते थे | खेल में इतना खो जाते थे की अध्यापक की डाट और उनके द्वारा भेजी गए घर में शिकायत से अक्सर सामना करते थे| और कभी कभी पिटाई भी हो जाती थी| लेकिन खेलों से रिश्ता अभी तक नहीं टूटा| रोज नए-नए खेल बनाये जाते थे और वादों के साथ बिना छल किये उन्हें खेला जाता था| खेलो में इतना डूब जाते थे खाने-पीने तक का ध्यान नहीं रहता था तब जीवन में प्रतिस्पर्धा नहीं थी न ही लोगो की हैसियत का अंदाजा उनके कपड़ो से लगाया जाता था जिसने हाथ बड़ा कर दोस्ती करनी चाही उसे दोस्त बना लिया |और खेल खेलना शुरू कर देते थे| कोई भी मिल जाता था बस उसके साथ में खलने लगते थे जो भी प्यार से मिलता उसके हो लेते | मिटटी में कपडे गंदे करने के बाद घर पर डाट भी पड़ती थी | फिर भी सब कुछ भूल कर अगला दिन इस आशा पर टिका रहता था की आज फिर कुछ नया करना है, खेलना है और बहुत सारी खुशियाँ अपने दामन में समेटना हैं |
मोहल्ले का हर व्यक्ति अपना सा लगता था ,उनकी हर खुशी में शामिल होना मानो एक रिवाज़ था| जीवन इतना कठिन नहीं था और न ही लोग कठोर थे सब कुछ हमारे हिसाब से होता था | उनकी नज़र में सब लोग एक जैसे ही होते थे| न कोई धर्म न कोई जाति| होली पर हुडदंग होता था, ईद बकरीद में भी सब आपस में मिलते थे| तब जीवन का एक मात्र उद्देश्य साथ मिल कर चलना था लड़ना झगडना नहीं| अगर हम झगडते भी थे तो बचपन की नादानियों में खेल खेल में उसे भुला देते थे और फिर जिंदगी का मजा लेने लगते थे| और थक हार कर जब हम अपने घर जाते थे वो माँ की प्यार भरी डाट खाने को मिलती थी| खाना तो बात में मिलता था लेकिन माँ कुछ ऐसी बाते बताती थी जो हमारे भविष्य को उज्जवल करने की सलाह देती थी कहती थी बेटा धुप में मत खेला करो तुम्हारी सेहत खराब हो जायेगी, अगर सेहत पे कुछ असर पड़ा तो तुम पढाई नहीं कर पाओगे, अगर पढ़ाई नहीं कर पाओगे तो जिंदगी जीने के नज़रिए को नहीं समझ पाओगे अगर तुम जिंदगी का नजरिया नहीं सिखते तो तुम्हे लोग आवारा, या ऐसे कई बातों से संबोधित करेंगे | लेकिन मैंने माँ से कहा की खेल ही जीवन बनाता है और जीवन बिगडता भी है| खेल आज ऐसे मुकाम पर पहुच चुका है की इसके जरिये हम आप का नाम रोशन कर सकते हैं, लेकिन मेरे इतने समझाने के बाद मेरी माँ ने कहा कि तुम सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान दोगे और खेल कूद की बाते आज से मेरे सामने नहीं करोगे| तब मैं खाना खाकर माँ की बात न मानते हुए मैं बल्ला और गेंद लेकर दोस्तों के साथ खेलने चला जाता था| और जब मैं शाम को घर वापस आता था तो मेरी माँ पिताजी से मेरी सिकायत करती थी की इतना समझाने के बाद भी ये लड़का अपनी हरकतों से बाज नहीं आता और मुझे बेवक़ूफ़ बना कर खेलने चला जाता है, तब पिताजी बहुत गुस्से में आकार डंडा उठाकर मेरी तरफ बढते तो मैं उछल कर पापा के सामने बेशर्मी से मुस्कुराकर भाग जाता था| और मस्ती करने के बाद फिर वापस आ जाता था और तब तक पिताजी का गुस्सा भी ठंडा हो जाता था| और यही सब बाते रोज चला करती थी| फिर पिताजी मुझे पास बुलाकर माँ की वही बाते, जो मुझे समझाया करती थी वही बाते वो बताया करते थे की तुम्हारी माँ जो बोल रही है वो बाते बहुत हद तक सही है |बेटा खेल को खेल की तरह से खेलो और साथ में पढ़ाई पे भी ध्यान लगाओ| केवल खेल खेलने से जिंदगी का रुख नहीं बदलता उसके लिए पढ़ाई भी जरुरी है जिसे ज्ञान प्राप्त होता है|
उस समय जीवन में थे कई तरह के रंग कई तरह के सपने दिन बीते रातें बीती और बचपन भी बीत गया| आज की इस भाग दौड दुनिया में बहुत कुछ पीछे छूट गया| कंप्यूटर, विडियो गेम, और कार्टून चैनल , ने बच्चो का बचपन छीन लिया है | वो उन खेलो से बहुत दूर हो चुके हैं जो कभी हमारे जीवन में खासा महत्व रखते थे| आबादी बढ़ने के साथ साथ पर्यावरण का दूषित होना भी इसका एक कारण है | जब वो बचपन याद आता है मेरा दिल भर जाता है मन करता है फिर से खेलू वो अलबेले खेल पर वक्त नहीं मिल पाता| उन दोस्तों का साथ भी छुट चुका है सबने पाने लिए कोई न कोई रास्ता खोज लिया है सबको प्रगति करनी है सब को आगे बढ़ना है| इन सबके बावजूद भी अगर कुछ नहीं बदला वो है हमारे बचपन की यांदे जो मन में आज भी समाई हुई हैं| गांहे-बगान्हें जो याद आ ही जाति हैं और इस भाग दौड भरी जिंदगी में कुछ पल की हंसी दे जाती हैं|

वीरेन्द्र कुमार की पेशकश

कोरोना के दौर का मानसिक सेहत पर असर

कोरोना महामारी ने लोगों के जीवन पर आर्थिक, शारीरिक, भावनात्मक और मानसिक रूप से बहुत ज्यादा प्रभावित किया है. भारत में अभी भी लगभग 178098 * ...